- छोटी सी बात रिश्ते को खूबसूरत बना सकती है. कभी जरा सी मुस्कुराहट और दूसरे का हृदय तुम्हारे लिये खुल जाता है, और तुम्हारी आंखों में कभी जरा सी कड़वाहट, और दूसरा तुम्हारे लिये बंद हो जाता है.
और इसके विपरीत भी है। जो व्यक्ति दूसरों के साथ संबंधित नहीं हो सकता, वह स्वयं से संबंधित होने में भी कठिनाई अनुभव करेगा, क्योंकि संबंधित होने की कला एक ही है. तुम चाहे दूसरों से संबंधित होओ, या स्वयं से संबंधित होओ, इससे कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ता-यह एक ही कला है।
ये दोनों कलाएं साथ-साथ सीखने की जरूरत है, उन्हें अलग नहीं किया जा सकता. लोगों के साथ होओ, लेकिन बेहोश में नहीं, बल्कि होशपूर्ण. लोगों से संबंधित होओ, जैसे कि तुम गीत गा रहे हो, जैसे कि तुम बांसुरी बजा रहे हो.हर व्यक्ति को ऐसा होना चाहिये जैसे वाद्ययंत्र। सम्मान करो, प्रेम करो, पूजा करो-क्योंकि हर व्यक्ति परमात्मा का छिपा रूप है.
इसलिए हमेशा ध्यान रखो. बहुत सजग होओ. ध्यान रखो कि कि तुम क्या कह रहे हो, ध्यान रखो कि तुम क्या कर रहे हो. छोटी सी बात रिश्ते को खत्म कर सकती है, और छोटी सी बात रिश्ते हो खूबसूरत बना सकती है. यह बहुत नाजुक घटना है। दूसरो के साथ रिश्ता आईना होना चाहिये।
देखो कि तुम क्या कर रहे हो, कैसे तुम इसे कर रहे हो, और क्या हो रहा है। देखो कि दूसरो को क्या हो रहा है कैसे तुम उनके लिये नर्क पैदा कर रहे हो? तो अलग हो जाओ. अपना ढंग बदलो. अपने आसपास जीवन को सुंदर बनाओ. सभी को महसूस होने दो कि तुम्हारे साथ होना एक उपहार है, सिर्फ तुम्हारे साथ होने से से कुछ प्रवाहित होने लगता है, कुछ फूल खिलने लगते है. यह सब महसूस होने दो लोगों को. और, जब अेकेले हो तो पूरी तरह मौन बैठो, संपूर्ण मौन में, और स्वयं को देखो. अपनी श्वास को देखो, अपने को पूर्णता में देखो बिना किसी दखल के बस देखना। यह बहुत होश जगाता है. तुम भीतर प्रकाश से भरते जाते हो. यह ध्यान की कला है।
दोनों याद रखों, ऐसा कि जैसा पक्षी के दो पंख होते है, वैसे ही प्रेम और ध्यान को अपने ही पंख हो जाने दो. दोनों के बीच के लयबद्धता पैदा करो ताकि वे किसी भी तरह से एक दूसरे के साथ द्वद में न रहे बल्कि एक-दूसरे को पोषित करे, एक-दूसरे को आहार दे, एक-दूसरे की मदद करें.

